शुक्रवार, 22 मई 2015
शुक्रवार, 26 अगस्त 2011
वंदना
वंदना
हे कृपानिधान ; करुणा की खान ,
तुझमे है अद्भुत ; शक्ति -ज्ञान |
तुझसे ही चलता ; ये सरसती -यान ,
तुझमे ही समाहित ; विश्व -महान ||
सूर्य बन ; इस वसुंधरा को ,
करता तू ही ; देदीप्यमान |
मेघ बन ; निज कालिमा से ,
ढक लेता ; तू ही आसमान ||
दया ,क्षमा ; करुणा ; के सागर,
तू है अपरमित ; गुणों की खान |
मै अनुरागी ; विवेकहीन नर,
कैसे करू ; तेरा बखान||
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हो हमारी ; अनुरक्ति तुझमे ,
करू मै ; तेरा ही गुणगान |
ऐसी मुझको ; शक्ति दे प्रभु ,
जपु सदा ; तेरा ही नाम ||
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शनिवार, 20 अगस्त 2011
हैलो ब्लागर मित्रों ! मै डॉ. सुशीला गुप्ता ,आपका मेरे ब्लाग पर हार्दिक अभिनन्दन है.
प्लीज़ ! मेरे ब्लॉग को एक बार ही सही पर जरूर रीड करे और अपनी पैनी दृष्टि से परीक्षण कर मुझे मेरी त्रुटियों से अवश्य अवगत कराएँ ...जिससे मैं और निखरकर आप लोगो के लिए कुछ नया लिखकर हिंदी साहित्य को और समृद्ध बना सकूँ . ......धन्यवाद्
डॉ. सुशीला गुप्ता .
बुधवार, 1 जून 2011
प्यारी भाभी
प्यार आता है |
तुम्हारे सिवा अब
न कोई भाता है ||
दिया प्यार तुमने
इतना मुझे |
जैसे हमारा,
वर्षों का नाता है ||
नहीं कोई शिकवा,
शिकायत मुझे |
हूँ आज खुश जो,
इनायत तेरी ||
श्रद्धा करूँ,तेरी भक्ति करूँ,
तेरे लिए, निशि-दिन मरुँ ||
तुझमे समाहित है मन मेरा,
है आज गद-गद ये दिल मेरा ||
खुशियाँ हो दामन में,तेरे सदा,
आंसूं न देना,ऐ मेरे खुदा ||
व्याकुल है दिल,होके तुमसे जुदा,
सबसे निराली है,मेरी भाभी की अदा ||
शुक्रवार, 27 मई 2011
बुधवार, 13 अप्रैल 2011
मंगलवार, 12 अप्रैल 2011
बुधवार, 16 मार्च 2011
मंगलवार, 15 मार्च 2011
.तू मुस्कुराना छोड़ दे
बहुत कमजोर हूँ मैं
तू मुस्कुराना छोड़ दे मेरे घावों में तू अब
मरहम लगाना छोड़ दे ||
निगाहें कातिल हैं तेरी
आँखे मिलाना छोड़ दे |
जीना न मुश्किल हो जाए
ये अदाएं छोड़ दे ||
बेबस हूँ मैं ,लाचार हूँ
यूँ दिल का लगाना छोड़ दे
न बन जाए ये अफसाना
कसमे -वादे तोड़ दे ||
प्यार ,मुहब्बत ,चाहत
लफ्जों को दुहराना छोड़ दे |
ऐ महबूब मेरे , दिलवर मेरे
तन्हाई ,रुसवाई से रिश्ता जोड़ ले ||
............................
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शुक्रवार, 11 मार्च 2011
रविवार, 6 मार्च 2011
बुधवार, 2 मार्च 2011
मंगलवार, 1 मार्च 2011
सोमवार, 28 फ़रवरी 2011
शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011
Swabhiman
फिर भी कहूँगा,
हकीकत नहीं |
देना चाहोगे-
हाथ उठाकर,
फिर भी कहूँगा-
नहीं साहब,
इसकी कोई-
जरुरत नहीं |
जानते हो क्यों ?
क्यों कि -
'आज'
पूर्व की भाँति-
इंसान में इंसानियत की-
सीरत नहीं रही |
'कुर्सी के लिए'
जाने कब 'वो'
खुद को बेच दे ,
'आज'
उनके उसूलो में,
हकीकत नहीं रही |
मंदिर - मस्जिद के नाम पर -
वहशी बने हुए है सब,
भाई को ही भाई की -
जरूरत नहीं रही
जब किसी मजलूम को -
सहारे कि जरूरत होती है
"तो"
झट से,"दामन"-
घसीट लेते हैं
"ये"
अपना,नेतागिरी के सिवाय -
इनमे,वतन-फरोशों के प्रति-
"जरा भी"
अकीदत नहीं रही |
हाय !कैसा आ गया जमाना,
देशद्रोहियों के आगे -
वतन-परस्तों की कोई,
कीमत नहीं रही |
....................
गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011
हर युग की अभिलाषा
अवनी-अम्बर समझ रहे है,मेरी तेरी भाषा,
होता पहले कौन घृणित है,मिलती किसे निराशा पूरी कर ले अंतिम इच्छा,हर युग की अ|भिलाषा,
आओ हम तुम मिलकर देखे,प्रभु का खेल तमाशा||
त्रेतायुग में हरण किया ,जोगी बन जनकसुता का,
विश्व-प्रतापी तू कहलाया, लहू बहा जनता का |
अट्टहास तू ही करता था, सब थे तेरे अनुगामी,
न भूलेगा कोई भी जन,तेरी अमर कहानी ||एक ओर अन्याय खड़ा है,एक ओर हैं दाता,
आओ हम तुम मिलकर देखें,प्रभु का खेल तमाशा ||
द्वापरयुग में किया था तूने,एक सती का यूँ अपमान,
भरी सभा में नंगा करके, बढ़ा लिया था अपनी शान |
बिखर गयी थी वह तन-मन से, निकल रही थी उसकी
जान,
हसता था पापी तू तबतक,जब तक आए न भगवान् ||
नहीं ज्ञात था शायद तुझको,सभी जगह हैं त्राता,
आओ हम-तुम मिलकर देखें,प्रभु का खेल तमाशा ||
त्रेता, द्वापर बीत गए, कलयुग की आई बरी,
तुझसे पीड़ित होकर मानव! सोच रही है हर नारी |
छल-बल से कब तक जीतेंगे, हम सबको ये अत्याचारी,
किस युग तक नीलम करेंगे, बेटी, बहू और महतारी ||
अब भी क्या तुम छुपे रहोगे! मेरे भाग्य-विधाता ?
आओ हम तुम मिलकर देंखे ,प्रभु का खेल तमाशा ||
...............
सोमवार, 20 दिसंबर 2010
दहेज़
किसने चलाया ऐसा चलन,
किसने जलाया ऐसा हवन
जिसमे जले सिर्फ नारी का तन,
जिससे मिले न कभी भी अमन ||
दहेज़ के नाम पर, बोलो अभी तक,
तुमने दिया किस -किस को कफ़न |
कौन मिटेगा, कौन हटाएगा,
बताओ मुझे क्या है, इसका जतन?
धूँ - धूँ के स्वाहा हो जाएगा,
करते रहो मन, बेटी बहुओं को
ऐसे ही जमीं पे दफ़न | |
पर बुझाओगे फिर, किससे अपनी तपन,
लूटोगे फिर किस पे, अपना ये धन ?
पुकारोगे फिर किसको, अपनी बहन,
जब सूना ही कर दोगे, सारा चमन ??
....................
किसने जलाया ऐसा हवन
जिसमे जले सिर्फ नारी का तन,
जिससे मिले न कभी भी अमन ||
दहेज़ के नाम पर, बोलो अभी तक,
तुमने दिया किस -किस को कफ़न |
कौन मिटेगा, कौन हटाएगा,
बताओ मुझे क्या है, इसका जतन?
धूँ - धूँ के स्वाहा हो जाएगा,
एक दिन ये अपना ,सारा चमन |
करते रहो मन, बेटी बहुओं को
ऐसे ही जमीं पे दफ़न | |
पर बुझाओगे फिर, किससे अपनी तपन,
लूटोगे फिर किस पे, अपना ये धन ?
पुकारोगे फिर किसको, अपनी बहन,
जब सूना ही कर दोगे, सारा चमन ??
....................
रविवार, 19 दिसंबर 2010
ग़ज़ल
बेवफाई ने तेरी दिल को, पत्थर बना दिया है
घावों में जालिम कैसे, नश्तर लगा दिया है |
तुझे क्या मालूम ये दिल, कैसे-कैसे जिया है
जग-हँसाई को इसने कैसे, छुप-छुप कर पिया है |
अब तो यह तन मेरा, बस बुझाता हुआ दिया है
जाने कब मिट जाए, तड़पा बहुत हिया है |
मेरी वफ़ा का तूने, अच्छा सिला दिया है
कोई क़सर न छोड़ी, जी भर जफ़ा किया है |
कहती हो खुद को सुशीला, पर क्या शील किया है,
अपने ही हाथों मुझको, सरे-समशीर किया है |
......................
घावों में जालिम कैसे, नश्तर लगा दिया है |
तुझे क्या मालूम ये दिल, कैसे-कैसे जिया है
जग-हँसाई को इसने कैसे, छुप-छुप कर पिया है |
अब तो यह तन मेरा, बस बुझाता हुआ दिया है
जाने कब मिट जाए, तड़पा बहुत हिया है |
मेरी वफ़ा का तूने, अच्छा सिला दिया है
कोई क़सर न छोड़ी, जी भर जफ़ा किया है |
कहती हो खुद को सुशीला, पर क्या शील किया है,
अपने ही हाथों मुझको, सरे-समशीर किया है |
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बुधवार, 8 दिसंबर 2010
दर्द
है कितनी निष्ठुर दुनिया,अब ये मैंने जाना|
यहाँ किसी ने मुझको, कब है अपना माना ||
जिसको मैंने अपनी, जान से ज्यादा चाहा |
उसने ही मुझसे मिलने पर, ऐसा किया बहाना ||
जैसे हो सदियों से, वह बिलकुल अनजाना|
अब दोस्त किसी की खातिर, तुम न अश्रु बहाना ||
नहीं तो जग समझेगा, उस पर है दीवाना |
शब्दों के तीर चलेगे, तुम बनोगे प्रथम निशाना||
तब तुम भूल जाओगे, प्रेम- प्रथा अपनाना|
सोचोगे सब मिथ्या है, मिथ्या है दिल का लगाना||
इति
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धर्म की आवाज
मेरे स्नेहिल मित्रों !
युगों से मै प्रसिद्ध हूँ,
फिर भी-तुम-सब मुझसे अनभिज्ञ हो,
मुझे जब हुआ यह ज्ञात|
"तो"-
मन में हुआ गहरा अघात|सुह्रद्वर!
मैं "धर्म" हूँ -
आस्थाओं का पुंज,
निर्लोभी,निष्काम |
मानव समाज का धारक तत्त्व|
रजस,तमस से विरक्त शुद्ध सत्त्व |
मेरे नाम को लेकर -
मत करो कत्ले-आम
मत उजाड़ो किसी सुहागिन की मांग
न लो किसी निर्दोष की जान
सुबह होने से पूर्व,मत करो-
किसी दुधमुहे की शाम |
नहीं तोह समाप्त हो जाएगा -
मेरा अस्तित्व |
हो जाएगा मेरा स्थान रिक्त|
मेरा लिए तो सभी है सामान |
चाहे हो अल्लाह,
चाहे हो राम|
एक है जिस्म,तो-
दूजा है जान|
तुम सबसे ही जीवित है -
मेरी मुस्कान|
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