सोमवार, 20 दिसंबर 2010

दहेज़

किसने चलाया ऐसा चलन,
     किसने जलाया ऐसा हवन 
            जिसमे जले सिर्फ नारी  का तन,
                      जिससे   मिले न कभी भी अमन ||


दहेज़ के नाम पर, बोलो अभी तक,
   तुमने  दिया   किस -किस को कफ़न |
        कौन मिटेगा, कौन हटाएगा,  
                 बताओ मुझे क्या है, इसका जतन?


धूँ - धूँ  के स्वाहा हो जाएगा,  
एक दिन ये अपना ,सारा चमन |

                     करते  रहो मन, बेटी बहुओं को


                  ऐसे ही जमीं पे दफ़न | | 
                   


पर बुझाओगे फिर, किससे अपनी तपन,



    लूटोगे फिर किस पे, अपना ये धन ?


           पुकारोगे फिर किसको, अपनी बहन,



                     जब सूना ही कर दोगे, सारा चमन  ?? 
                       
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रविवार, 19 दिसंबर 2010

ग़ज़ल

बेवफाई ने तेरी दिल को, पत्थर बना दिया है   
घावों में जालिम कैसे, नश्तर लगा दिया है | 


तुझे क्या मालूम ये दिल, कैसे-कैसे जिया है 
जग-हँसाई को इसने कैसे, छुप-छुप कर पिया है | 


अब तो यह तन मेरा, बस बुझाता हुआ दिया है 
जाने कब मिट जाए, तड़पा बहुत हिया है | 


मेरी वफ़ा का तूने, अच्छा  सिला दिया है 
कोई क़सर न छोड़ी, जी भर जफ़ा किया है |


कहती हो खुद को सुशीला, पर क्या शील किया है,
अपने ही हाथों मुझको, सरे-समशीर किया है |


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बुधवार, 8 दिसंबर 2010

दर्द

  है कितनी निष्ठुर दुनिया,अब ये मैंने जाना|

  यहाँ किसी ने मुझको, कब है अपना माना ||

जिसको मैंने अपनी, जान से ज्यादा चाहा |

उसने ही मुझसे मिलने पर, ऐसा किया बहाना ||

जैसे हो सदियों से, वह बिलकुल अनजाना|

अब दोस्त किसी की खातिर, तुम न अश्रु बहाना ||

नहीं तो जग समझेगा, उस पर है  दीवाना |

शब्दों के तीर चलेगे, तुम बनोगे प्रथम निशाना||

तब तुम भूल जाओगे, प्रेम- प्रथा अपनाना|

सोचोगे सब मिथ्या है, मिथ्या है दिल का लगाना||



                                     इति


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धर्म की आवाज

मेरे स्नेहिल मित्रों !
युगों से मै प्रसिद्ध हूँ,
फिर भी-
तुम-सब मुझसे अनभिज्ञ हो,
मुझे जब हुआ यह ज्ञात|
"तो"-
मन में हुआ गहरा अघात|
सुह्रद्वर!
मैं "धर्म" हूँ -
आस्थाओं का पुंज,
निर्लोभी,निष्काम |
मानव समाज का धारक तत्त्व|
रजस,तमस से विरक्त शुद्ध सत्त्व |
मेरे नाम को लेकर -
मत करो कत्ले-आम
मत उजाड़ो किसी सुहागिन की मांग
न लो किसी निर्दोष की जान
सुबह होने से पूर्व,मत करो-
किसी दुधमुहे की शाम |
नहीं तोह समाप्त हो जाएगा -
मेरा अस्तित्व |
हो जाएगा मेरा स्थान रिक्त|
मेरा लिए तो सभी है सामान |
चाहे हो अल्लाह,
चाहे हो राम|
एक है जिस्म,तो-
दूजा है जान|
तुम सबसे ही जीवित है -
मेरी मुस्कान|




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सोमवार, 6 दिसंबर 2010

Budhapa

जिंदगी के इस सफ़र में ,मैं  अकेला हो चुका हूँ,
चार दिन की थी कहानी, सब झमेला खो चुका हूँ |

अब तो बस,सांसो की सिहरन, और बाकी है घुटन,
दिनों-दिन घटता ही जाता, है इस तन का वजन |

है मुझे अहसास पूरा, कि  ये बुढ़ापे का असर है,
हर वस्तु अब भी पूर्ववत है, बस धुंधली मेरी नज़र है |

पर जाने क्यूँ बढाती जाती, मेरे मन की जिज्ञासा,
क्यों  जिजीविषा बाकी अब भी,जब पाई है गहन निराशा |

कांप रहा, यह सुन तन मेरा, क्यों कहते सब मुझको बोर,
हर पल, हर क्षण ,बड़ी आ रही, देखो म्रत्यु मेरी ही ओर |

शून्य हो गयी उथल-पुथल सब, क्षीण हो गए सारे सपने,
आज बची बस टूटी खटिया,छोड़ चले मुझे सारे अपने |

कल तक समझ नहीं पाता था, क्यों मेरे तन में सिकुड़न है,
बच्चे, पत्नी, निर्धन, लुच्चे,हर जन में क्यों इतनी अकड़न है!

पर अब  मैं   यह समझ गया, यह जीवन एक सपन है,
रजा-रंक कोई भी हो, होते सभी दफ़न है |

मरने के बाद सभी के, होते बंद नयन है
हर प्राणी पाता बस,दो गज सिर्फ कफ़न है |

बस जीवित वह ही रहते है, प्यारा जिनको वतन है,
युगों-युगों तक उनकी श्रद्धा में, करते सभी नमन है |


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प्रश्न

कब तक करोगे इस धरती पर,
नारी का तुम यूँ अपमान ? 

क्या  ज्ञात नहीं !  तुमको मानव,
बल से ही बनता बलवान ?

उसकी ही शक्ति से तुम, 
बने हुए हो शक्ति-मान | 

जननी के अथक परिश्रम से ही,
प्राप्त किया ये कीर्ति-मान |

निज रक्त-सुधा से सिंचित करके,
बना दिया जिसने महान |

उसको ही अबला संबोधित कर,
मिटा रहे उसकी पहचान |

माना कि तुम परुष जाति हो,
पर इसका है क्यूँ अभिमान ? 

पुरुषत्व तुमारा कर्म नहीं,  
यह तो  स्रष्टि  का है विधान |

इससे अवलंबित होकर तुम,
कहते  हो खुद को क्यूँ महान ?

करोगे कब तक...........................?????

  

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

अहसास

जब-जब चला ,तब-तब जला |

कल्पना साकार करने,

भावना से प्यार करने,

पोत की  पतवार   बनने,

जोत पर ऐतवार करने,

जब-जब चला, तब-तब जला |

नफरतों को तोड़ने,

दो दिलों को जोड़ने,

पाप से मुख मोड़ने,

सत्यता की होड़ में,

जब-जब चला, तब-तब जला.............|    

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