रविवार, 6 मार्च 2011
बुधवार, 2 मार्च 2011
मंगलवार, 1 मार्च 2011
सोमवार, 28 फ़रवरी 2011
शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011
Swabhiman
फिर भी कहूँगा,
हकीकत नहीं |
देना चाहोगे-
हाथ उठाकर,
फिर भी कहूँगा-
नहीं साहब,
इसकी कोई-
जरुरत नहीं |
जानते हो क्यों ?
क्यों कि -
'आज'
पूर्व की भाँति-
इंसान में इंसानियत की-
सीरत नहीं रही |
'कुर्सी के लिए'
जाने कब 'वो'
खुद को बेच दे ,
'आज'
उनके उसूलो में,
हकीकत नहीं रही |
मंदिर - मस्जिद के नाम पर -
वहशी बने हुए है सब,
भाई को ही भाई की -
जरूरत नहीं रही
जब किसी मजलूम को -
सहारे कि जरूरत होती है
"तो"
झट से,"दामन"-
घसीट लेते हैं
"ये"
अपना,नेतागिरी के सिवाय -
इनमे,वतन-फरोशों के प्रति-
"जरा भी"
अकीदत नहीं रही |
हाय !कैसा आ गया जमाना,
देशद्रोहियों के आगे -
वतन-परस्तों की कोई,
कीमत नहीं रही |
....................
गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011
हर युग की अभिलाषा
अवनी-अम्बर समझ रहे है,मेरी तेरी भाषा,
होता पहले कौन घृणित है,मिलती किसे निराशा पूरी कर ले अंतिम इच्छा,हर युग की अ|भिलाषा,
आओ हम तुम मिलकर देखे,प्रभु का खेल तमाशा||
त्रेतायुग में हरण किया ,जोगी बन जनकसुता का,
विश्व-प्रतापी तू कहलाया, लहू बहा जनता का |
अट्टहास तू ही करता था, सब थे तेरे अनुगामी,
न भूलेगा कोई भी जन,तेरी अमर कहानी ||एक ओर अन्याय खड़ा है,एक ओर हैं दाता,
आओ हम तुम मिलकर देखें,प्रभु का खेल तमाशा ||
द्वापरयुग में किया था तूने,एक सती का यूँ अपमान,
भरी सभा में नंगा करके, बढ़ा लिया था अपनी शान |
बिखर गयी थी वह तन-मन से, निकल रही थी उसकी
जान,
हसता था पापी तू तबतक,जब तक आए न भगवान् ||
नहीं ज्ञात था शायद तुझको,सभी जगह हैं त्राता,
आओ हम-तुम मिलकर देखें,प्रभु का खेल तमाशा ||
त्रेता, द्वापर बीत गए, कलयुग की आई बरी,
तुझसे पीड़ित होकर मानव! सोच रही है हर नारी |
छल-बल से कब तक जीतेंगे, हम सबको ये अत्याचारी,
किस युग तक नीलम करेंगे, बेटी, बहू और महतारी ||
अब भी क्या तुम छुपे रहोगे! मेरे भाग्य-विधाता ?
आओ हम तुम मिलकर देंखे ,प्रभु का खेल तमाशा ||
...............
सोमवार, 20 दिसंबर 2010
दहेज़
किसने चलाया ऐसा चलन,
किसने जलाया ऐसा हवन
जिसमे जले सिर्फ नारी का तन,
जिससे मिले न कभी भी अमन ||
दहेज़ के नाम पर, बोलो अभी तक,
तुमने दिया किस -किस को कफ़न |
कौन मिटेगा, कौन हटाएगा,
बताओ मुझे क्या है, इसका जतन?
धूँ - धूँ के स्वाहा हो जाएगा,
करते रहो मन, बेटी बहुओं को
ऐसे ही जमीं पे दफ़न | |
पर बुझाओगे फिर, किससे अपनी तपन,
लूटोगे फिर किस पे, अपना ये धन ?
पुकारोगे फिर किसको, अपनी बहन,
जब सूना ही कर दोगे, सारा चमन ??
....................
किसने जलाया ऐसा हवन
जिसमे जले सिर्फ नारी का तन,
जिससे मिले न कभी भी अमन ||
दहेज़ के नाम पर, बोलो अभी तक,
तुमने दिया किस -किस को कफ़न |
कौन मिटेगा, कौन हटाएगा,
बताओ मुझे क्या है, इसका जतन?
धूँ - धूँ के स्वाहा हो जाएगा,
एक दिन ये अपना ,सारा चमन |
करते रहो मन, बेटी बहुओं को
ऐसे ही जमीं पे दफ़न | |
पर बुझाओगे फिर, किससे अपनी तपन,
लूटोगे फिर किस पे, अपना ये धन ?
पुकारोगे फिर किसको, अपनी बहन,
जब सूना ही कर दोगे, सारा चमन ??
....................
रविवार, 19 दिसंबर 2010
ग़ज़ल
बेवफाई ने तेरी दिल को, पत्थर बना दिया है
घावों में जालिम कैसे, नश्तर लगा दिया है |
तुझे क्या मालूम ये दिल, कैसे-कैसे जिया है
जग-हँसाई को इसने कैसे, छुप-छुप कर पिया है |
अब तो यह तन मेरा, बस बुझाता हुआ दिया है
जाने कब मिट जाए, तड़पा बहुत हिया है |
मेरी वफ़ा का तूने, अच्छा सिला दिया है
कोई क़सर न छोड़ी, जी भर जफ़ा किया है |
कहती हो खुद को सुशीला, पर क्या शील किया है,
अपने ही हाथों मुझको, सरे-समशीर किया है |
......................
घावों में जालिम कैसे, नश्तर लगा दिया है |
तुझे क्या मालूम ये दिल, कैसे-कैसे जिया है
जग-हँसाई को इसने कैसे, छुप-छुप कर पिया है |
अब तो यह तन मेरा, बस बुझाता हुआ दिया है
जाने कब मिट जाए, तड़पा बहुत हिया है |
मेरी वफ़ा का तूने, अच्छा सिला दिया है
कोई क़सर न छोड़ी, जी भर जफ़ा किया है |
कहती हो खुद को सुशीला, पर क्या शील किया है,
अपने ही हाथों मुझको, सरे-समशीर किया है |
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बुधवार, 8 दिसंबर 2010
दर्द
है कितनी निष्ठुर दुनिया,अब ये मैंने जाना|
यहाँ किसी ने मुझको, कब है अपना माना ||
जिसको मैंने अपनी, जान से ज्यादा चाहा |
उसने ही मुझसे मिलने पर, ऐसा किया बहाना ||
जैसे हो सदियों से, वह बिलकुल अनजाना|
अब दोस्त किसी की खातिर, तुम न अश्रु बहाना ||
नहीं तो जग समझेगा, उस पर है दीवाना |
शब्दों के तीर चलेगे, तुम बनोगे प्रथम निशाना||
तब तुम भूल जाओगे, प्रेम- प्रथा अपनाना|
सोचोगे सब मिथ्या है, मिथ्या है दिल का लगाना||
इति
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धर्म की आवाज
मेरे स्नेहिल मित्रों !
युगों से मै प्रसिद्ध हूँ,
फिर भी-तुम-सब मुझसे अनभिज्ञ हो,
मुझे जब हुआ यह ज्ञात|
"तो"-
मन में हुआ गहरा अघात|सुह्रद्वर!
मैं "धर्म" हूँ -
आस्थाओं का पुंज,
निर्लोभी,निष्काम |
मानव समाज का धारक तत्त्व|
रजस,तमस से विरक्त शुद्ध सत्त्व |
मेरे नाम को लेकर -
मत करो कत्ले-आम
मत उजाड़ो किसी सुहागिन की मांग
न लो किसी निर्दोष की जान
सुबह होने से पूर्व,मत करो-
किसी दुधमुहे की शाम |
नहीं तोह समाप्त हो जाएगा -
मेरा अस्तित्व |
हो जाएगा मेरा स्थान रिक्त|
मेरा लिए तो सभी है सामान |
चाहे हो अल्लाह,
चाहे हो राम|
एक है जिस्म,तो-
दूजा है जान|
तुम सबसे ही जीवित है -
मेरी मुस्कान|
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सोमवार, 6 दिसंबर 2010
Budhapa
चार दिन की थी कहानी, सब झमेला खो चुका हूँ |
दिनों-दिन घटता ही जाता, है इस तन का वजन |
है मुझे अहसास पूरा, कि ये बुढ़ापे का असर है,
हर वस्तु अब भी पूर्ववत है, बस धुंधली मेरी नज़र है |
पर जाने क्यूँ बढाती जाती, मेरे मन की जिज्ञासा,
क्यों जिजीविषा बाकी अब भी,जब पाई है गहन निराशा |
कांप रहा, यह सुन तन मेरा, क्यों कहते सब मुझको बोर,
हर पल, हर क्षण ,बड़ी आ रही, देखो म्रत्यु मेरी ही ओर |
शून्य हो गयी उथल-पुथल सब, क्षीण हो गए सारे सपने,
आज बची बस टूटी खटिया,छोड़ चले मुझे सारे अपने |
कल तक समझ नहीं पाता था, क्यों मेरे तन में सिकुड़न है,
बच्चे, पत्नी, निर्धन, लुच्चे,हर जन में क्यों इतनी अकड़न है!
पर अब मैं यह समझ गया, यह जीवन एक सपन है,
रजा-रंक कोई भी हो, होते सभी दफ़न है |
मरने के बाद सभी के, होते बंद नयन है
हर प्राणी पाता बस,दो गज सिर्फ कफ़न है |
बस जीवित वह ही रहते है, प्यारा जिनको वतन है,
युगों-युगों तक उनकी श्रद्धा में, करते सभी नमन है |
.....................*.. ..................
प्रश्न
नारी का तुम यूँ अपमान ?
क्या ज्ञात नहीं ! तुमको मानव,
बल से ही बनता बलवान ?
बने हुए हो शक्ति-मान |
जननी के अथक परिश्रम से ही,
प्राप्त किया ये कीर्ति-मान |
निज रक्त-सुधा से सिंचित करके,
बना दिया जिसने महान |
उसको ही अबला संबोधित कर,
मिटा रहे उसकी पहचान |
माना कि तुम परुष जाति हो,
पर इसका है क्यूँ अभिमान ?
पुरुषत्व तुमारा कर्म नहीं,
यह तो स्रष्टि का है विधान |
इससे अवलंबित होकर तुम,
कहते हो खुद को क्यूँ महान ?
करोगे कब तक...........................?????
शनिवार, 4 दिसंबर 2010
अहसास
कल्पना साकार करने,
भावना से प्यार करने,
पोत की पतवार बनने,
जोत पर ऐतवार करने,
जब-जब चला, तब-तब जला |
नफरतों को तोड़ने,
दो दिलों को जोड़ने,
पाप से मुख मोड़ने,
सत्यता की होड़ में,
जब-जब चला, तब-तब जला.............|
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