सोमवार, 6 दिसंबर 2010

प्रश्न

कब तक करोगे इस धरती पर,
नारी का तुम यूँ अपमान ? 

क्या  ज्ञात नहीं !  तुमको मानव,
बल से ही बनता बलवान ?

उसकी ही शक्ति से तुम, 
बने हुए हो शक्ति-मान | 

जननी के अथक परिश्रम से ही,
प्राप्त किया ये कीर्ति-मान |

निज रक्त-सुधा से सिंचित करके,
बना दिया जिसने महान |

उसको ही अबला संबोधित कर,
मिटा रहे उसकी पहचान |

माना कि तुम परुष जाति हो,
पर इसका है क्यूँ अभिमान ? 

पुरुषत्व तुमारा कर्म नहीं,  
यह तो  स्रष्टि  का है विधान |

इससे अवलंबित होकर तुम,
कहते  हो खुद को क्यूँ महान ?

करोगे कब तक...........................?????

  

1 टिप्पणी:

adarsh000 ने कहा…

मातृसत्ता को शत-शत नमन....... ।